मोहबत की कहानियों का दीदार-ए-यार की दास्ता

एक लड़का है जो रोज शाम मेंमेरे बालकनी के सामनेआता है,हैऔर घंटों इंतजार के बाद जब उसकी महबूबा आती है वो उसका दीदार करता है,है इशारों-इशारों मेंथोड़ी बातेंकरता और फिर मुस्कुरा कर चलाजाता है।है कई दिन सेहम येकिस्सा ऑब्जर्वकर रहे थेगुस्सा तो बड़ा आता कि,”जो करना है करो पर मेरे कंधेपर बंदूक क्यों चला रहे हो भाई!?”पर जब उसके दीदार-ए-यार हासिल हो जानेके बाद वाली मुस्कान पर नजर जाती तो मेरा सारा गुस्सा छू हो जाता। जब कभी नैना को आनेमेंदेर होती तो शान पास वाली फोन की दुकान पर चला जाता और वक्त गुजारी के लिए कभी बेतुकी सी बातेंकरता, तो कभी बेफिजूल सी हरकतें। नैना के दीदार के बाद ही वो वहां सेजाता। जब कभी उसको देर हो जाती तो,शान थोड़ा मायूस तो होता पर ना-उम्मीद नहीं,शायद उसेपता था कि वो जरूर आएगी और होता भी क्यों नही।

मोहब्बत मेंतो इल्हाम होता है

हि। इधर उसके ना आनेपर शान का हाल जैसेपानी सेनिकाली मछली जैसा हो गया था,और होता भी क्यों ना आखिरकार उसका ये ताजा इश्क जो था। एक-दो दिन तक वो बेचारा किसी दिल टूटे आशिक की तरह दर-दर की ठोकरें खा रहा था। अगलेकुछ दिन तक वो नजर नहीं आया। हमेंलगा कि उसकी नई मोहब्बत का बुखार अब ठीक हो गया। पर नई मोहब्बत इतना हौसला तो देती है,हैकि कुछ किया जाए, दीदार-ए-यार के लिए कुछ एक्शन लिया जाए!! इस किस्सेको बीतेकुछ ही दिन हुए थेकि मैंनेशान को सामनेवाली दुकान पर कुछ काम करतेदेखा। आख़िरकार उसनेअपनेमसलेका हल ढूंढ ही लिया था। उसनेवहां पर काम करना शुरू कर दिया था। वैसेइस मामलेमेंशान की दाद देनी पड़ेगी। उसनेमांझी की तरह कोई पहाड़ तो नहीं तोड़ा पर अपनी मोहब्बत को ताड़नेके लिए,थोड़ा मशक्कत वाला ही सही मगर एक जरिया जरूर ढूंढ निकाला था। दुकान घर के सामनेहोनेकी वजह सेकिसी ना किसी वजह सेदीदारए-यार नसीब हो ही जाता था। नैना के पैरंट्स नेमामलेकी गंभीरता को देखतेहुए,

शान को निकालनेकी बात कही,पर दुकान मालिक ठहरे एक आलसी बोले,”जो करना है करो हम इस लड़के को नहीं निकाल सकते! येमेरा राइट हैंडहैं है।है”अब बेचारे उसके पेरेंट्स करे भी तो
क्या!?दुकान घर के सामनेथी। और भाई नैना तो नैना थी कोई ना कोई बहाना ढूंढ लेती है। अब देखतेहैं, हैं आगे इनकी कहानी कौन सा नया मोड़ लेती है?

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